Thursday, April 3, 2008

ख़ामोश ये निगाहे

ये ग़ज़ल हिंदोस्तान और पाकिस्तान के नाम

रिश्तो मे एसी काई जमी की आज शबब मदहोश है
दिलो मे एसी पड़ी दरारे की मुदतो से ज़ुबान ख़ामोश है

ग़ज़ल

एक जैसे हम एक फजा एक ही ज़ुबान
फिर एस दिल मे फ़र्क आ गया कहाँ

मिलता है संगीत, मिलते है रश्मो रिबाज़
क्या सरहदे बनने से बट जाता है जहाँ

होती एक जैसी शाम, एक ही सुब्ह
फिर क्यू बदल गये दिल के अरमान

चाहते तो है हम गिराना ये ढिबार
मगर लामबेहआई फ़ासले -ए- दरमियाँ

देख रही है राश्ता ख़ामोश ये निगाहे
शायद कही ज़ुक आए ये आसमाण

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