मैनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा,
मैनू जब भी तुसी हो याद आये,
दिन दिहाडे शराब ले बैठा,
किनी बीती ते किनी बाकी ऐ,
मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा.....
कवि शिव कुमार बटालवी
Friday, April 17, 2009
इंतज़ार
उनकी बाहो मे अजीब सा संसार मिला
माँगा था खुदा से इतना प्यार मिला
देखती राहू एक टक बन के चकोर
हमको एशे चाँद का दीदार मिला
गुज़ार लू तमाम उमर जिसकी बाहो मे
ए दिल बटला क्यू इतना इसको इंतज़ार मिला
कितनी तन्हा थी ज़िंदगी, जो ये पल ना था
खिल गये दिल मे फूल एसा ख़ुशगूबार मिला
कोई छेड़ता था दिल से, बनके अजनबी
लगता है बेशा ही कोई हमको दिलदार मिला
मत छेड़ ए नेश कही पागल ना हो जौ
छोटी सी उमिदो को एसा एतबार मिला
माँगा था खुदा से इतना प्यार मिला
देखती राहू एक टक बन के चकोर
हमको एशे चाँद का दीदार मिला
गुज़ार लू तमाम उमर जिसकी बाहो मे
ए दिल बटला क्यू इतना इसको इंतज़ार मिला
कितनी तन्हा थी ज़िंदगी, जो ये पल ना था
खिल गये दिल मे फूल एसा ख़ुशगूबार मिला
कोई छेड़ता था दिल से, बनके अजनबी
लगता है बेशा ही कोई हमको दिलदार मिला
मत छेड़ ए नेश कही पागल ना हो जौ
छोटी सी उमिदो को एसा एतबार मिला
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